साजापानी में नन्हे हाथी की छठी पर सात गांवों ने मनाई खुशियां, राम कीर्तन और वनभोज का हुआ आयोजन

शरद पूर्णिमा पर ग्रामीणों की अनूठी पहल ने दिया मानव-हाथी सह-अस्तित्व का संदेश, वन विभाग ने की सराहना
कोरबा। आमतौर पर हाथियों की मौजूदगी से ग्रामीण इलाकों में डर और चिंता का माहौल रहता है, लेकिन कोरबा जिले के ग्राम साजापानी में नन्हे हाथी के जन्म ने खुशियों का माहौल बना दिया। यहां ग्रामीणों ने शरद पूर्णिमा के अवसर पर नन्हे हाथी की छठी धूमधाम से मनाई। इस सामुदायिक आयोजन में साजापानी सहित आसपास के सात गांवों के ग्रामीण शामिल हुए। माता के मंदिर में राम कीर्तन और वनभोज के साथ आयोजित इस कार्यक्रम ने इंसानों और वन्यजीवों के बीच सह-अस्तित्व की एक प्रेरक तस्वीर पेश की।
दशहरे के दिन हुआ था नन्हे हाथी का जन्म
कोरबा वनमंडल के करतला वन परिक्षेत्र अंतर्गत साजापानी क्षेत्र में 20 अक्टूबर 2026 को दशहरे के दिन एक नन्हे हाथी का जन्म हुआ था। इसके बाद 25 अक्टूबर को शरद पूर्णिमा के अवसर पर ग्रामीणों ने उसकी छठी मनाने का निर्णय लिया। इस मौके पर बड़ी संख्या में ग्रामीण एकत्रित हुए और नन्हे हाथी के जन्म की खुशी साझा की। ग्रामीणों ने माता के मंदिर में राम कीर्तन किया तथा सामूहिक वनभोज का आयोजन भी किया। इस पहल ने वन्यजीवों के प्रति ग्रामीणों के जुड़ाव और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता को सामने रखा।

डर के बीच वन्यजीवों के प्रति संवेदनशीलता की मिसाल
छत्तीसगढ़ के कई वन क्षेत्रों में हाथियों की आवाजाही के कारण ग्रामीणों को फसलों, घरों और जान-माल की सुरक्षा की चिंता बनी रहती है। कई बार मानव-हाथी संघर्ष की घटनाएं इंसानों और हाथियों, दोनों के लिए गंभीर खतरा बन जाती हैं। ऐसे माहौल में साजापानी के ग्रामीणों द्वारा नन्हे हाथी के जन्म को उत्सव के रूप में मनाना एक सकारात्मक संदेश देता है।
यह आयोजन बताता है कि वन्यजीवों के प्रति जागरूकता, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी की भावना विकसित करना संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। जंगल में रहने वाले वन्यजीव हमारी प्राकृतिक विरासत का हिस्सा हैं और उनकी सुरक्षा के लिए स्थानीय समुदाय की भागीदारी भी जरूरी है।
वन विभाग ने ग्रामीणों की पहल को बताया प्रेरणादायक
कार्यक्रम में उपवनमंडलाधिकारी मणिकांत वर्मा भी शामिल हुए। उन्होंने ग्रामीणों के आमंत्रण को स्वीकार करते हुए इस पहल के लिए उनका आभार जताया। उन्होंने कहा कि साजापानी के ग्रामीणों ने हाथियों के प्रति लगाव और सह-अस्तित्व की भावना का उदाहरण प्रस्तुत किया है। अन्य गांवों में भी वन्यजीवों के प्रति ऐसी संवेदनशीलता विकसित हो और लोग वन विभाग के साथ मिलकर काम करें, तो मानव-हाथी संघर्ष को कम करने में मदद मिल सकती है।
वन विभाग के अनुसार, हाथियों की गतिविधियों पर नियमित निगरानी रखी जा रही है। संवेदनशील क्षेत्रों में रात्रिकालीन गश्त, मुनादी और व्हाट्सएप समूहों के माध्यम से ग्रामीणों तक हाथियों की मौजूदगी से जुड़ी सूचनाएं पहुंचाई जाती हैं। लोगों को हाथियों से सुरक्षित दूरी बनाए रखने और उनकी मौजूदगी की जानकारी मिलने पर तत्काल वन विभाग को सूचित करने के लिए भी जागरूक किया जाता है।
सह-अस्तित्व के लिए जरूरी है जनभागीदारी
वन्यजीवों का संरक्षण केवल वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि इसमें स्थानीय लोगों की भागीदारी भी अहम है। जंगल के आसपास रहने वाले ग्रामीण हाथियों की गतिविधियों और उनके आवागमन के रास्तों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दे सकते हैं। समय पर सूचना, सतर्कता और वन विभाग के साथ समन्वय से संभावित जोखिमों को कम करने में मदद मिल सकती है।
साजापानी में नन्हे हाथी की छठी के बहाने सात गांवों के ग्रामीणों ने वन्यजीवों के प्रति संवेदनशीलता और सामुदायिक सहभागिता का संदेश दिया। शरद पूर्णिमा पर आयोजित यह कार्यक्रम एक स्थानीय उत्सव से आगे बढ़कर प्रकृति और इंसान के रिश्ते को मजबूत करने की प्रेरक पहल बन गया। यह संदेश भी सामने आया कि हाथियों से जुड़ी चुनौतियों के बीच जागरूकता, सावधानी और आपसी सहयोग के जरिए मानव-हाथी सह-अस्तित्व की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।




